” मिस्ट्री मैन”

बात पिछले महीने की हैै। यूूँ कहूँ तो इस बात की शुरूआत तो पिछले दिसंबर से ही हुई। बस मेरे आलस ने ही उस मिस्ट्री और मिस्ट्री मैन पर से पर्दा उठने नहीं दिया था।

तो सुनिये बात कुछ ऐसी है कि , ओह! पहले खुद की जरा एक और तारीफ कर लूँ तब बताती हूँ क्या थी बात। तो क्या है ना कि मुझे देर रात जागने की आदत है। सब सो जाते हैं और मैं घर के दरवाजे खिड़कियों से बाते करती हूँ रात में। अरे नहीं मजा़क कर रहीं हूँ। पर हाँ  जागती हूँ देर तक।

तो फिर कहानी कुछ ऐसी है कि दिसंबर की सर्दियों की रात थी। रात के एक बजे, नींद नहीं आने की वजह से मैं अपने फोन के सारे एप्स का मुआयना कर रही थी। तभी बाहर से आती हुई एक आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा। आवाज ऐसी जैसे कोई फेरीवाला लगाता है ना, सामान बेचने के लिये। जैसे दूर से आवाज़ लगाता हुआ आ रहा हो और आवाज़ लगाते लगाते आगे चला जा रहा हो। अब आप कहेंगे भला इसमें क्या मिस्ट्री है भई।  अब कोई बताये के रात के एक डेढ़ बजे कौन फेरीवाला घुमता है। बस यही ख्याल सहसा मेरे दिमाग में भी आया। पर उठ कर बाहर जा कर देखने की ज़हमत मैंने उठाई नहीं। फिर ऐसे ही कई रातें बीतती चली गईं । हर रात एक ही समय पर गाड़ियों के आने जाने के बीच ,उस फेरीवाले जैसी आवाज़ दूर से आती हई फिर पास और फिर दूसरी तरफ दूर तक जाती हुई सुनायी देती। एक तो ठंड का मौसम, रात का वक्त और मेरा आलसीपन, और बहुत थोड़े से डर की वजह से मैंने कभी बाहर निकल कर देखने की कोशिश की ही नहीं कि कौन है या हो सकता है। सुबह होते ही भूल जाती,पर फिर रात में आवाज़ सुनकर सोच में पड़ जाती कि आखिर कौन हो सकता है । और ऐसा होते होते दो महीने और बीत गये। मैं हर रात को उधेड़ बुन में रहती पर ,रात को टाइम पास भी अच्छा था। कौन है,क्या है सोचते सोचते नींद आ जाती थी।फिर   एक दिन अचानक ही पतिदेव को मैंने ये बात बतायी। उन्हें शायद मेरी बात की गंभीरता का एहसास नहीं हुआ। बारबार कहने पर उन्होंने मुझसे कहा कि,” ठीक है, आज रात जब वो आवाज़ सुनाई दे तो,मुझे जगाना जरा।”,” मैं भी तो सुनुँ के इतनी रात को कौन क्या बेचता है। और आज उठ कर देख भी लेंगे।”

अब ऐसा कह कर पतिदेव तो घोड़े बेच कर सो गये,पर मुझे नींद कहाँ । मैं करने लगी इंतजार उस मिस्ट्री मैन का। फिर रात के एक बजे,मैंने घड़ी देखा और मेरे कान तैनात हो गये उस मिस्ट्री मैन की आवाज़ सुनने को। बस थोड़ी ही देर के बाद आवाज़ आना शुरू हो गयी। मैंने झट से पतिदेव को जगाया और कहा कि,” सुनो आज फिर वही आवाज़ आ रही है।” उन्होंने भी ध्यान से सुना, आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होने लगी।फिर आगे बढ़ गई। अब बात तो उठ कर देखने की भी हुई थी,पर कच्ची नींद, थकान की वज़ह से उन्होंने उठ कर देखना कैंसिल कर दिया और मझे एक नसीहत देकर वापस सो गये,कि छोड़ो जाने दो,इन बातों पर धयान ना दो। उफ्फ ! आज भी पता नहीं लगा पाई यही ख्याल मन में लिये मैं भी सो गयी।

पर दूसरे ही दिन माँ आने वाली थी । उनके आने पर बातों ही बातों में जि़क्र छिड़ गयी उस आवाज़ की। फिर हमने फैसला किया कि आज रात तो उस आवाज़ पर से पर्दा उठा कर ही रहेंगे। अब तक तो सबकी उत्सुकता बढ़ चुकी थी। तो बस गप्पें मारते मारते हमने एक बजा ही लिया, और करने लगे इंतजार उस मिस्ट्री मैन का। देखते देखते डेढ़ फिर दो फिर ढाई बज गये पर वो नहीं आया , ना उसकी आवाज़ सुनाई पड़ी। ऐसा लगा मानो कि जैसे उसे खबर हो गई हो के हम उसका इंतजार कर रहें हैं ।

अब तो मेरी उत्सुकता और भी ज्यादा बढ़ गयी थी। पर क्या करते ,सो सोने चले गये। और उस दिन  कोई आवाज नहीं  सुनायी पड़ी। पर अगले ही  दिन ,सब के सोने के बाद जब मैं सोने की तैयारी कर रही थी,अचानक ही वही जानी पहचानी सी पर अन्जानी सी,आवाज फिर कानों में पड़ी। इस बार मैं ये मौका चूकना नहीं चाहती थी,इसलिये आनन फानन में दौड़ती हुई बालकनी में पहुँची। आवाज़ धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ रही थी। गाड़ियों का जाम लगा था सो मुझे कोई नज़र नहीं आ रहा था। फिर धीरे धीरे जाम में खड़े  ट्रकों के बीच से एक आदमी निकला ,जिसके एक  हाथ में एक  बाल्टी थी प्लास्टिक के कप से भरी और दूसरे हाथ में चाय की केटली थी। और वो आवाज लगाता हुआ हर ट्रक वाले से पुछता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। चाय -चाय, चाय -चाय करता हुआ वो मिस्ट्री मैन मेरे सामने से ओझल हो गया। और मैं , मैं क्या चुपचाप बालकनी का दरवाजा बंद किया और जा कर सो गयी। इतने वक्त से उलझी मिसट्री जो सुलझ गयी थी। वैसे एक बात बताऊँ कल ही ध्यान आया मुझे के गाड़ियों के जाम तो अब भी लगते हैं,पर अब रात में वो आवाज़ मुझे सुनाई नहीं देती है।

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