*बेमौसम बरसात*

 

सुबह उठी तो मौसम ने ख़ुद ही अपना हाल बयाँ कर दिया।रात भर बारिश हुई है मोहतरमा। उफ्फ! अब ये क्या मुसीबत है बताओ जरा। अब और नहीं तो क्या, अब दो बच्चों की माँ ठंडी में हुई इस बेमौसम बारिश को कोसे नहीं तो क्या आरती उतारे।
दो दिनों से बच्चे बीमार थे। बड़ी मुश्किल से आज स्कूल जा पाएंगे, पर अब ये बारिश, कहीं फिर बीमार पड़ गये तो। बेमौसम और बेमतलब की इस बारिश ने तो सुबह सुबह मुड ही खराब कर दिया। फिर क्या टोपी,मफलर ,दस्ताने पहना कर और अदरक हल्दी वाला काढ़ा पिला कर, बच्चों को स्कूल बस पर बिठा आई। मन ही मन भगवान से अर्ज़ी भी लगाते हुये कि बच्चों का ख्याल रखना भगवान जी। अभी अभी तो ठीक हुये हैं।
यूँ ही बारिश का रोना रोते रोते घर पहुँची वापस। फिर लगा जैसे मौसम ने मन बना लिया हो मेरा मूड ठीक करने का। हाँ तभी तो अचानक ही अदरक वाली चाय का ख्याल हो आया। अब नेक ख्याल में देरी कैसी सो झट से अदरक इलायची वाली चाय बना कर मैं जम गयी अपनी फेवरिट जगह पर। अरे, वही हॉल में बालकनी से लगा वो सोफा। वहीं जहाँ पर बैठ कर मेरे ख्यालों को जैसे उड़ान मिल जाती है।
अब जब चाय के घूंट के साथ बाहर बारिश को निहारा, क्या सुंदर नजारा है ये। धूल के चादर से ढकी वो बोझल सी हरियाली जैसे फिर से ताजा हो गई हो। इस ठंडी में पेड़ों को बारिश ने नहला धुला कर साफ कर दिया। सारे पुराने पीले पत्ते झड़ कर रास्तों पर बिखरे हुये हैं और ताजा ताजा हरियाली इतरा रही है।वो पहाडों पर होता है न जैसे, हल्की हल्की ठंड,उस पर कभी कभी की बारिश और सुहाना सा मौसम।बस वैसा ही तो लग रहा है अभी सब। घर बैठे पहाडों की सैर कर आयी मैं तो।
अब तक जिस बारिश को कोस रही थी,अब वही मुझे मन ही मन गुदगुदा रही थी। डर और गुस्सा तो कब का चाय की घूंट के साथ ही छूमंतर हो गया था। हाँ बच्चों की चिंता तो फिर भी थी। पर इस बेमौसम और बेमतलब की बारिश ने मुझे ख्याालों की दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया था।

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