“जिंदगी “

आज सुबह बस चाय का कप हाथ में पकड़े, अपने फेवरिट सोफे पर बैठी थी। चाय और सर्दी की धूप दोनों ही का मजा ले रही थी, कि बीते रात की बातें ज़हन में दौड़ गयीं।
वही बातें जिन्हें सोचते सोचते न जाने कब आँख लग गई थी मेरी कल रात।
हुआ यूँ था कि घड़ी में लगभग नौ बज रहे होंगे। किचेन के काम खत्म कर अभी बैठी ही थी, इतने में बाहर से बैन्ड बाजे की आवाज़ जोर शोर से सुनाई देने लगी। हाँ और क्या बारात ही थी। मैं भी निकल कर आ गई अपनी बालकनी में। बड़ी रौनक थी सभी झूम रहे थे। क्या बच्चे क्या बुढ़े। हर जेनरेशन अपने अपने तरीके का बाराती डांस करने में मगन था। दुल्हा तो घोड़ी पर बैठे बैठे ही झूम रहा था। तभी देखा दुल्हा हाथ उपर कर किसी को इशारा कर रहा था, तो देखा बगल वाले होटल के कमरे कि बालकनी से दुल्हन हाथ हिला कर इशारे कर रही है। तो कभी खुशी से उछल रही है।सच कहूँ, तो उन्हें देख कर ना, मुहल्ले की आन्टियों की तरह मैंने भी मन ही मन बुदबुदाया, “जरूर लव मैरिज होगी। ” अब क्या करूँ इंसानी फितरत है।

  1.    पर सच कहती हूँ दुल्हन को देख कर मुझे बड़ी खुशी हुई,वरना तो दुल्हन शर्माती सकुचाती सी ही नजर आती है। खैर, तभी बैन्ड पर फेमस बाराती धुन बजने लगी,फिर दुल्हा और दुल्हन दोनों ही अपनी अपनी जगह पर ही झूमने लगे। दुल्हा घोड़ी पर और दुल्हन बालकनी में। और बारातियों की जोश के तो क्या कहने। चारों तरफ रंग रौनक, चमक दमक और खुशहाली नजर आ रही थी। सब को झूमते देख तो एक बार को मेरे पैर भी अपनी ही जगह पर थिरकने से लगे। न जाने क्यूँ पर बड़ी खुशी से भर उठा था मेरा भी मन। यूँ कह लो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना। फिर उन हँसते मुसकुराते चेहरों की चमक समेट मैं अपने कमरे में वापस आ गई।
    थोड़ी ही देर के बाद फोन पर आये किसी मेसेज को पढ़ कर पतिदेव काफी परेशान दिखे।पुछा तो उन्होंने बताया, “अभी अभी पास वाली चौक पर चार मजदूरों को ट्रक ने कुचल दिया,और सब की मौत हो गई। ” , “ओह” खुशियोँ के ख्याल को झटक कर मन अचानक अफसोस से भर गया। मैं फिर निकल कर बालकनी में आई पर अब स्याह अंधेरा था वहाँ। कुछ दिखाई तो नहीं दे सकता था पर कुछ शोर तो सुनाई दे रहा था। अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। अभी अभी तो ऱौनक और खुशहाली देख कर गई थी यहाँ से। एक तरफ नजर डालो तो नई जिंदगी की पहल थी और दूसरी तरफ जिंदगियाँ ही खत्म हो गईं थीं।
    और इस बार मन किसी की तकलीफ से भर आया। ऊफ अब उनके परिवारों का क्या होगा। कैसे कब क्या हो जाये, क्युँ इसकी भनक तक नहीं पड़ती इंसान को। और बताऊँ कौन थे वो मजदूर, वही जो इस बारात में लाईट्स लेकर साथ चल रहे थे। बारात लगा कर लौट रहे होंगें घर,अन्जान इस बात से कि सड़क के उस पार से कोई उनकी मौत बन कर निकला है। किसी की खुशियोँ में रौशनी भर रहे थे। जिन्हें पता भी न था के कुछ पल बाद ही उनकी जिंदगियों की रौशनी बुझने वाली है। अपने कंधों पर उजाला ढो रहे थे, आज लोग उन्हें कंधों पर ढो रहे होंगे। अब क्या कहेंगे हम सब, यही तो खेल है जिंदगी का, वक्त का या किस्मत का। वैसे जिंदगी खु़द को इतना हमें समझने कहाँ देती है,कि हम कुछ कह पायें उसके बारे में।

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